कोठड़ा उपस्वास्थ्य केंद्र में ‘हाजिरी का खेल’ PART-2! : खबर छपी तो सफाईकर्मी के पक्ष में उतरे बीएमओ! बोले—‘डेंगू हुआ है, इसलिए काम पर नहीं आ रही’
Shiv Kumar Upwal
तीन महीने की कथित अनियमितता पर सवाल... जवाब में सामने आया आज की बीमारी का हवाला!
शिव उपवाल, 9993990544...✍️
निसरपुर, धार 7 सितम्बर 2026। कोठड़ा उपस्वास्थ्य केंद्र में ठेके पर कार्यरत सफाई कर्मचारी की कथित अनियमित उपस्थिति और पूरे महीने के भुगतान को लेकर *सामना आलोचना* में खबर प्रकाशित होने के बाद अब मामला और गरमा गया है।
खबर सामने आने के बाद निसरपुर बीएमओ डॉ. जितेंद्र दूधी द्वारा सफाई कर्मचारी के पक्ष में सफाई दिए जाने की बात सामने आई है। पत्रकार से बातचीत में बीएमओ ने कथित तौर पर कहा कि सफाई कर्मचारी को डेंगू हो गया है, इसलिए वह काम पर नहीं आ रही है।
लेकिन यहीं से कहानी में सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—

तीन महीने के सवाल का जवाब ‘आज का डेंगू’ कैसे?
खबर में सवाल जून, जुलाई और अगस्त में दर्ज उपस्थिति, मौके पर कथित कम मौजूदगी और भुगतान की प्रक्रिया को लेकर उठाए गए थे। ऐसे में यदि कर्मचारी को वर्तमान समय में डेंगू हुआ है और इसी कारण वह काम पर नहीं आ रही हैं, तो यह बीमारी पिछले महीनों की कथित अनियमित उपस्थिति का स्पष्टीकरण कैसे बन सकती है? यही वह सवाल है जिसका जवाब अब स्वास्थ्य विभाग को देना चाहिए।
बीएमओ की सफाई ने बढ़ाए सवाल!
अगर कर्मचारी की अनुपस्थिति बीमारी के कारण थी, तो सवाल सीधा है—
क्या बीमारी की सूचना विभाग को दी गई थी?
क्या मेडिकल दस्तावेज उपलब्ध हैं?
क्या बीमारी के दौरान अवकाश स्वीकृत हुआ?
और सबसे अहम—जिस अवधि की हाजिरी और भुगतान पर सवाल उठे हैं, उसका रिकॉर्ड क्या कहता है?
क्योंकि मामला केवल आज कर्मचारी काम पर आई या नहीं आई, इसका नहीं है।
मामला है पिछले महीनों की उपस्थिति और उसके आधार पर हुए भुगतान के सत्यापन का।
सीएचओ बोले—‘कभी-कभी आती हैं’... अब बीएमओ बोले—‘डेंगू है’
मामले में पहले संस्था प्रमुख सीएचओ डॉ. प्रवीण गंधवानी का बयान सामने आया था कि संबंधित सफाई कर्मचारी ‘कभी-कभी आती हैं।’अब खबर प्रकाशित होने के बाद बीएमओ की ओर से बीमारी का हवाला सामने आया है। दोनों बातों के बीच विभागीय रिकॉर्ड की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
अगर कर्मचारी नियमित रूप से कार्यरत थीं—तो उपस्थिति रिकॉर्ड क्या कहता है?
अगर अनुपस्थित थीं—तो अवकाश का रिकॉर्ड कहां है?
अगर बीमारी के कारण अनुपस्थित थीं—तो मेडिकल प्रमाण और स्वीकृत अवकाश कहां है?
सवाल सफाईकर्मी से नहीं, सिस्टम से है!
यह मामला किसी कर्मचारी को कटघरे में खड़ा करने से ज्यादा सरकारी व्यवस्था की निगरानी प्रणाली पर सवाल खड़ा करता है।
ठेका कर्मचारी की हाजिरी कौन देखता है?
हाजिरी कौन प्रमाणित करता है?
ठेकेदार बिल किस आधार पर प्रस्तुत करता है?
अधिकारी किस आधार पर उसे सत्यापित करते हैं?
और अंततः भुगतान की स्वीकृति किस रिकॉर्ड के आधार पर होती है?
इन सवालों के जवाब बीमारी की एक वजह बताने से नहीं मिलेंगे।
खड़ी कलम का सीधा सवाल
तीन महीने के रिकॉर्ड पर सवाल उठा... जवाब में आज की बीमारी क्यों
अगर डेंगू था तो मेडिकल रिकॉर्ड कहां है?
अगर बीमारी नहीं थी तो अनुपस्थिति का हिसाब कौन देगा?
और अगर हाजिरी सही थी तो रजिस्टर सामने रखने में दिक्कत क्या है?
मुद्दा किसी कर्मचारी की बीमारी पर सवाल उठाना नहीं है।
मुद्दा यह है कि जिस अवधि की उपस्थिति और भुगतान पर सवाल उठे हैं, उस अवधि का सरकारी रिकॉर्ड क्या कहता है।
अब स्वास्थ्य विभाग के सामने दो ही रास्ते हैं—
रिकॉर्ड सामने रखकर स्थिति साफ करे या फिर स्वतंत्र जांच कराकर दूध का दूध और पानी का पानी करे।
क्योंकि सामना आलोचना का सवाल किसी व्यक्ति से नहीं...
उस व्यवस्था से है, जहां हाजिरी का हिसाब कागज पर हो और जमीन पर सवाल!
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