पत्रकार पर हाथ उठा तो हंगामा... भ्रष्ट व्यवस्था पर हाथ कौन डालेगा? : शाहीन खान-नफीसा खान प्रकरण ने फिर खड़ा किया बड़ा सवाल—क्या हम घटना के बाद जागने वाला समाज बन गए हैं?
Shiv Kumar Upwal
धार, शुक्रवार, 04 सितम्बर 2026। दिल्ली में 4PM News Network की पत्रकार शाहीन खान और नफीसा खान के साथ मारपीट का मामला पत्रकारिता की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर गंभीर बहस का विषय बन गया है। यदि पत्रकारों के साथ सवाल पूछने के कारण दुर्व्यवहार या हिंसा हुई है, तो इसकी निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई होना जरूरी है।
क्योंकि पत्रकार का हथियार सवाल है और लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं है।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच खड़ी कलम एक ऐसा सवाल पूछती है, जो शायद ज्यादा असहज है—
हम तब ही क्यों जागते हैं, जब घटना कैमरे में कैद हो जाए?
भ्रष्टाचार आज कोई अनजाना शब्द नहीं है। फाइल आगे बढ़ाने से लेकर नियमों की अनदेखी तक, प्रभाव के इस्तेमाल से लेकर शिकायतों की अनदेखी तक—व्यवस्था पर सवाल समय-समय पर उठते रहे हैं। लेकिन असली खतरा सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं है।
खतरा तब बढ़ता है, जब भ्रष्टाचार सामान्य लगने लगे।
जब रिश्वत को “काम करवाने का तरीका” समझ लिया जाए, अनियमितता पर “सब जगह ऐसा ही होता है” कहकर पर्दा डाल दिया जाए और शिकायत करने वाले को ही परेशानी समझा जाने लगे, तब समस्या किसी एक व्यक्ति या कार्यालय की नहीं रहती। वह व्यवस्था की संस्कृति बन जाती है।
छोटी चुप्पियां बड़ी मनमानी को जन्म देती हैं
किसी व्यवस्था में मनमानी अचानक पैदा नहीं होती। पहले छोटी गलती को नजरअंदाज किया जाता है। फिर उसे सामान्य बताया जाता है। फिर उसके खिलाफ आवाज उठाने वाला अकेला पड़ जाता है। और धीरे-धीरे जवाबदेही कमजोर होती चली जाती है। यहीं से लोकतंत्र की नींव कमजोर पड़ती है।
लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है—सवाल पूछने की आजादी, जवाब मांगने का अधिकार और कानून का समान रूप से लागू होना।
भ्रष्टाचार सिर्फ पैसों का खेल नहीं
भ्रष्टाचार का नुकसान केवल सरकारी धन तक सीमित नहीं रहता। यह नागरिक और व्यवस्था के बीच भरोसा कमजोर करता है, ईमानदार व्यक्ति को हतोत्साहित करता है और यह धारणा मजबूत करता है कि “बिना प्रभाव या पैसे के काम नहीं होगा।” और जिस दिन यह सोच समाज में सामान्य हो गई, उस दिन भ्रष्टाचार केवल कार्यालय की समस्या नहीं रहेगा। वह सामाजिक मानसिकता बन जाएगा।

पत्रकार पर हमला अंतिम तस्वीर है... बीमारी कहीं पुरानी है!
जब किसी पत्रकार के साथ कथित मारपीट की खबर सामने आती है, तो बहस घटना पर केंद्रित हो जाती है।
लेकिन सवाल यह भी है—
सवाल पूछने वाले को असुविधा क्यों माना जाने लगा?
जवाबदेही मांगने वाले से टकराव क्यों पैदा होता है?
क्या व्यवस्था में ऐसी शिकायतों के लिए पर्याप्त सुरक्षा और स्वतंत्र जांच की व्यवस्था है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या हम गलत को उसके शुरुआती स्तर पर रोकते हैं या तब जागते हैं, जब मामला सुर्खियां बन जाता है?
सवाल किसी एक अधिकारी से नहीं... पूरी व्यवस्था से है
पत्रकारों की सुरक्षा जरूरी है। नागरिकों के अधिकारों की रक्षा जरूरी है। लेकिन इसके साथ जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है। शिकायत पर कार्रवाई कितनी होती है?
जांच के बाद जिम्मेदारी तय कितनी होती है?
गलत पाए जाने पर कार्रवाई कितनी होती है?
और जनता को उस कार्रवाई की जानकारी कितनी मिलती है?
क्योंकि जवाबदेही के बिना कानून केवल कागज बनकर रह जाता है।
खड़ी कलम का सीधा सवाल
पत्रकार सवाल पूछेगा तो उसे सुरक्षा कौन देगा?
भ्रष्टाचार देखकर समाज चुप रहेगा तो व्यवस्था बदलेगी कैसे?
छोटी अनियमितताओं को नजरअंदाज करेंगे तो बड़ी मनमानी कब रुकेगी?
और यदि हर बार घटना के बाद ही समाज जागेगा, तो घटना रोकने की व्यवस्था कौन बनाएगा?
लोकतंत्र को सिर्फ हिंसा से नहीं, खामोशी से भी खतरा है
शाहीन खान और नफीसा खान के मामले में यदि कानून का उल्लंघन हुआ है, तो निष्पक्ष जांच और कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन बहस केवल एक घटना तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। हमें उस माहौल पर भी सवाल उठाना होगा, जिसमें सवाल पूछना असुविधा और जवाबदेही मांगना टकराव समझा जाने लगे। लोकतंत्र की कमजोरी केवल तब दिखाई नहीं देती, जब किसी पत्रकार पर हमला होता है।
वह बहुत पहले शुरू हो जाती है—
जब समाज भ्रष्टाचार देखकर चुप रहता है।
जब गलत देखकर आंखें फेर लेता है।
जब शिकायत करने वाले को ही परेशानी समझा जाता है।और जब समाज यह मान लेता है कि—“कुछ नहीं बदलने वाला।” यही सोच लोकतंत्र की सबसे बड़ी हार है।
क्योंकि भ्रष्टाचार व्यवस्था को अंदर से खोखला करता है... और खामोशी उसे बाहर से मजबूत दिखाती है।
खड़ी कलम का अंतिम सवाल
सवाल पूछने वालों को सुरक्षा कब मिलेगी और सवालों से डरने वाली व्यवस्था जवाबदेह कब बनेगी?
संपादक : शिवकुमार उपवाल,
सामना आलोचना
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