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दिग्गज मंच पर, सामने कुर्सियां खाली! : निसरपुर में भाजपा के शक्ति प्रदर्शन की खुली पोल?

Shiv Kumar Upwal

50 minutes ago 89 views
निसरपुर में भाजपा के शक्ति प्रदर्शन की खुली पोल?

प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और प्रभारी मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की मौजूदगी के बीच खाली कुर्सियों ने खड़े किए तीखे सवाल; जिला ग्रामीण अध्यक्ष चंचल पाटीदार और निसरपुर मंडल अध्यक्ष की संगठनात्मक रणनीति पर निशाना, क्षेत्रीय कांग्रेस कार्यकर्ता ने फेसबुक पोस्ट से घेरा

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शिव उपवाल....✍️

निसरपुर,धार 12 अक्टूबर 2026 । बड़े नेताओं का काफिला, मंच पर दिग्गजों की मौजूदगी और संगठन की ताकत दिखाने का सुनहरा अवसर—लेकिन सामने खाली कुर्सियां! निसरपुर में भाजपा के कार्यक्रम की तस्वीर ने स्थानीय संगठन की तैयारियों पर ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनसे बचना अब आसान नहीं होगा। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और प्रभारी मंत्री कैलाश विजयवर्गीय जैसे बड़े नेताओं की मौजूदगी के बावजूद यदि दर्शक दीर्घा में कुर्सियां खाली नजर आईं, तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर स्थानीय संगठन ने इस बड़े आयोजन के लिए किया क्या था?

यह सवाल सिर्फ निसरपुर मंडल अध्यक्ष की तैयारियों तक सीमित नहीं है। धार जिला ग्रामीण अध्यक्ष चंचल पाटीदार के नेतृत्व में संगठन की सक्रियता और मंडल स्तर पर समन्वय को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। आखिर जब प्रदेश स्तर के नेता निसरपुर पहुंचे थे, तब क्या संगठन के पास जनभागीदारी जुटाने की कोई ठोस रणनीति थी? क्या कार्यकर्ताओं को केवल स्वागत-सत्कार की जिम्मेदारी मिली थी, या जनता को कार्यक्रम तक लाने की भी कोई योजना बनाई गई थी?

नेता बड़े, आयोजन बड़ा, फिर भी कुर्सियां खाली क्यों?

भाजपा अक्सर अपने मजबूत संगठन और कार्यकर्ताओं की विशाल फौज का दावा करती है। ऐसे में सवाल है कि जब प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी मंत्री जैसे दिग्गज नेता एक ही कार्यक्रम में मौजूद हों, तो स्थानीय संगठन के लिए इससे बड़ा अवसर और क्या हो सकता था? फिर भी यदि सामने खाली कुर्सियां दिखाई दें, तो क्या इसे आयोजन की तैयारियों पर सवाल उठाने वाला संकेत नहीं माना जाना चाहिए?

क्या मंडल अध्यक्ष ने बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया था? क्या गांव-गांव तक कार्यक्रम की सूचना पहुंचाई गई थी? क्या लोगों को जोड़ने के लिए जिम्मेदारियां तय की गई थीं? या फिर संगठन ने यह मान लिया था कि बड़े नेताओं का नाम ही भीड़ जुटाने के लिए काफी है?

मंच पर नेताओं की मौजूदगी संगठन की उपलब्धि हो सकती है, लेकिन सामने खाली कुर्सियां जनभागीदारी की रणनीति पर सवाल जरूर खड़े करती हैं।

चंचल पाटीदार और मंडल अध्यक्ष से सवाल—संगठन की ताकत आखिर दिखाई कहां दी?

धार जिला ग्रामीण अध्यक्ष चंचल पाटीदार और निसरपुर मंडल अध्यक्ष के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रदेश स्तर के नेताओं के आगमन को स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली आयोजन में बदलने के लिए क्या प्रयास किए गए थे?

यदि तैयारियां पूरी थीं, तो खाली कुर्सियों की तस्वीर सामने क्यों आई? यदि कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं, तो उनका असर आयोजन में कितना दिखाई दिया? क्या कार्यक्रम के बाद संगठन इस बात की समीक्षा करेगा कि जनभागीदारी अपेक्षा के अनुरूप रही या नहीं?

बड़े नेताओं के स्वागत में कोई कमी नहीं छोड़ी गई हो, लेकिन जनता की मौजूदगी ही सवालों के घेरे में आ जाए, तो संगठन को अपनी प्राथमिकताओं पर विचार करना ही होगा। आखिर राजनीति में केवल मंच सजाने से संगठन मजबूत नहीं होता; उसकी ताकत मैदान में दिखाई देनी चाहिए।

कांग्रेस कार्यकर्ता की फेसबुक पोस्ट ने बढ़ाई राजनीतिक तपिश

कार्यक्रम में खाली कुर्सियों का मुद्दा अब सोशल मीडिया तक भी पहुंच गया है। क्षेत्रीय कांग्रेस कार्यकर्ता ने अपने फेसबुक अकाउंट पर पोस्ट साझा कर तीखे सवाल दागे हैं। इस पोस्ट के जरिए भाजपा के आयोजन, स्थानीय संगठन की तैयारियों और जनभागीदारी को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

विपक्ष को भाजपा पर सवाल उठाने का मौका क्यों मिला? क्या स्थानीय संगठन ने ऐसा अवसर खुद उपलब्ध कराया? जब प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी मंत्री की मौजूदगी वाला कार्यक्रम हो, तब विपक्ष के हाथ में खाली कुर्सियों की तस्वीर चर्चा का विषय बन जाए, तो यह स्थानीय संगठन के लिए आत्ममंथन का विषय जरूर है।

हालांकि, फेसबुक पोस्ट और तस्वीरों के आधार पर पूरे कार्यक्रम की सफलता या विफलता का अंतिम फैसला नहीं किया जा सकता। लेकिन इनसे उठे सवालों का जवाब केवल दावों से नहीं, बल्कि वास्तविक उपस्थिति और आयोजन की तैयारियों के तथ्यों से देना होगा।

स्वागत की चमक के पीछे जनभागीदारी की कमजोरी तो नहीं?

राजनीतिक आयोजनों में मंच, माला, स्वागत और भाषणों पर खूब ध्यान दिया जाता है। मगर असली परीक्षा तब होती है, जब जनता को कार्यक्रम से जोड़ना हो। क्या निसरपुर में इस परीक्षा के लिए पर्याप्त तैयारी की गई थी?

क्या मंडल स्तर पर बैठकें हुई थीं? क्या कार्यकर्ताओं को गांवों और बस्तियों तक पहुंचने की जिम्मेदारी दी गई थी? क्या जिला नेतृत्व ने तैयारियों की निगरानी की थी? और यदि सब कुछ योजनानुसार हुआ था, तो खाली कुर्सियों को लेकर उठ रहे सवालों की वजह क्या है?

इन सवालों का जवाब देना संबंधित संगठनात्मक पदाधिकारियों की जिम्मेदारी है। उनकी प्रतिक्रिया सामने आने पर ही तस्वीर के दूसरे पहलू को भी समझा जा सकेगा।

अब संगठन बताए—चूक कहां हुई?

निसरपुर का यह घटनाक्रम भाजपा के स्थानीय संगठन के लिए एक असहज सवाल छोड़ गया है। प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी मंत्री की मौजूदगी किसी भी मंडल के लिए अपनी सक्रियता प्रदर्शित करने का बड़ा अवसर होती है। लेकिन यदि ऐसे मौके पर भी जनभागीदारी सवालों में घिर जाए, तो आयोजन की रणनीति की समीक्षा जरूरी हो जाती है।

अब सवाल यह है कि क्या धार जिला ग्रामीण अध्यक्ष चंचल पाटीदार और निसरपुर मंडल अध्यक्ष इस पूरे मामले पर स्थिति स्पष्ट करेंगे? क्या संगठन बताएगा कि कार्यक्रम में लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए क्या तैयारी की गई थी? या फिर खाली कुर्सियों की तस्वीर को नजरअंदाज कर आगे बढ़ जाना ही आसान रास्ता चुना जाएगा?

क्योंकि राजनीति में बड़े नेताओं को मंच पर बैठाना एक बात है और जनता को मैदान तक लाना दूसरी। निसरपुर में चर्चा अब इसी अंतर की हो रही है।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—जब प्रदेश के दिग्गज नेता मौजूद थे, तब निसरपुर मंडल संगठन अपनी ताकत का प्रभावशाली प्रदर्शन क्यों नहीं कर पाया? जवाब तस्वीरों से नहीं, संगठन के जिम्मेदार पदाधिकारियों को देना होगा।

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