मंत्री का दौरा बना संगठन की परीक्षा,मेघनाथ घाट की तस्वीरों ने खोल दी : विकास की चर्चा कम, संगठन की सक्रियता पर उठे ज्यादा प्रश्न | बड़े आयोजन में सीमित कार्यकर्ता क्यों? स्थानीय नेतृत्व पर चर्चा तेज
Shiv Kumar Upwal
शिवकुमार उपवाल,9993990544 ✍️
निसरपुर,धार 3 अगस्त । राजनीति में बड़े नेताओं के दौरे केवल विकास कार्यों का निरीक्षण भर नहीं होते, बल्कि वे स्थानीय संगठन की ताकत, कार्यकर्ताओं के उत्साह और नेतृत्व की स्वीकार्यता की भी परीक्षा होते हैं। मेघनाथ घाट स्थित प्रस्तावित क्रूज पोर्ट निर्माण कार्यों के निरीक्षण के लिए केंद्रीय राज्य मंत्री एवं सांसद सावित्री ठाकुर का दौरा भी कुछ ऐसा ही अवसर था। लेकिन कार्यक्रम समाप्त होते-होते विकास कार्यों से अधिक चर्चा आयोजन की तस्वीरों और सीमित कार्यकर्ता उपस्थिति को लेकर होने लगी।
प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी क्रूज परियोजना के निरीक्षण के लिए केंद्रीय मंत्री का आगमन स्थानीय संगठन के लिए अपनी सक्रियता दिखाने का सुनहरा अवसर था। उम्मीद थी कि बूथ स्तर से लेकर मंडल स्तर तक कार्यकर्ताओं की बड़ी भागीदारी देखने को मिलेगी, लेकिन तस्वीरें कुछ और ही कहानी कहती नजर आईं। कार्यक्रम में अपेक्षित भीड़ दिखाई नहीं दी और यही बात पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गई।

चंद कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने खड़े किए सवाल
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी केंद्रीय मंत्री के दौरे में कार्यकर्ताओं की उपस्थिति संगठन की जीवंतता का सबसे बड़ा पैमाना होती है। ऐसे में जब कार्यक्रम में अपेक्षित संख्या में कार्यकर्ता नजर नहीं आए, तो सवाल उठना स्वाभाविक था। स्थानीय स्तर पर चर्चा रही कि चंद कार्यकर्ताओं की उपस्थिति ने मंडल स्तर के संगठनात्मक समन्वय पर प्रश्नचिह्न लगा दिए।
लोगों के बीच यह सवाल भी गूंजता रहा कि क्या कार्यक्रम की जानकारी सभी कार्यकर्ताओं तक समय पर पहुंची थी? क्या संगठन के भीतर संवाद मजबूत है? या फिर स्थानीय स्तर पर सक्रियता में कमी आ रही है?

विकास का मंच, लेकिन संगठन नहीं दिखा प्रभावी
केंद्रीय मंत्री सावित्री ठाकुर ने अधिकारियों के साथ क्रूज पोर्ट निर्माण कार्यों का निरीक्षण किया, गुणवत्ता और समयबद्ध निर्माण के निर्देश दिए, मां नर्मदा का पूजन-अर्चन किया तथा स्थानीय लोगों की श्मशान घाट की मांग पर सकारात्मक आश्वासन भी दिया। विकास के मोर्चे पर उनका संदेश स्पष्ट था, लेकिन संगठनात्मक तस्वीर ने अलग ही बहस छेड़ दी।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि विकास योजनाओं की सफलता केवल सरकारी घोषणाओं से नहीं, बल्कि संगठन और जनता की भागीदारी से तय होती है। यदि इतना बड़ा कार्यक्रम भी कार्यकर्ताओं को एकजुट नहीं कर पाया, तो भविष्य के लिए आत्ममंथन आवश्यक है।

सवाल जिनसे बचना आसान नहीं
👉क्या स्थानीय संगठन सभी कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चल पा रहा है?
👉क्या बड़े कार्यक्रमों की तैयारी और समन्वय में कमी रह गई?
👉क्या कार्यक्रम के बाद संगठन स्तर पर समीक्षा होगी?
👉क्या भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो, इसके लिए रणनीति बनेगी?
इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं, लेकिन इतना तय है कि मेघनाथ घाट का यह दौरा केवल विकास परियोजना तक सीमित नहीं रहा। इसने स्थानीय संगठन की कार्यशैली और सक्रियता पर भी गंभीर चर्चा शुरू कर दी है।
खड़ी कलम
"राजनीति में असली ताकत मंच पर खड़े चेहरों से नहीं, बल्कि मैदान में खड़े कार्यकर्ताओं से मापी जाती है। बड़े नेता का दौरा यदि संगठन की ताकत दिखाने के बजाय सवाल छोड़ जाए, तो आत्ममंथन की जरूरत होती है। विकास की योजनाएं जितनी बड़ी हों, उन्हें सफल बनाने के लिए उतना ही मजबूत संगठन भी जरूरी होता है। तस्वीरें चर्चा बटोर सकती हैं, लेकिन संगठन की वास्तविक शक्ति कार्यकर्ताओं की भागीदारी से ही साबित होती है।"
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