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निसरपुर में पानी की दो विशाल टंकियां,फिर भी प्यासे पुनर्वास के बाशिंद : 20 लाख लीटर क्षमता का जल भंडारण, लेकिन छह दिनों से बूंद-बूंद पानी को तरस रहे विस्थापित; ‘मोटर जल गई’ का रटा-रटाया जवाब देकर जिम्मेदारों ने झाड़ा पल्ला!

Shiv Kumar Upwal

2 hours ago 126 views
20 लाख लीटर क्षमता का जल भंडारण, लेकिन छह दिनों से बूंद-बूंद पानी को तरस रहे विस्थापित; ‘मोटर जल गई’ का रटा-रटाया जवाब देकर जिम्मेदारों ने झाड़ा पल्ला!

आदर्श पुनर्वास के दावों की खुली पोल, आखिर कब जागेगा एनवीडीए विभाग?

शिव उपवाल,9993990544

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निसरपुर (धार)। करोड़ों की योजनाएं, पानी की विशाल टंकियां और पुनर्वास को आदर्श बनाने के सरकारी दावे... लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि निसरपुर पुनर्वास के बाशिंदे आज भी पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधा के लिए तरस रहे हैं। एनवीडीए विभाग की 10-10 लाख लीटर क्षमता वाली दो विशाल पानी की टंकियां होने के बावजूद लोगों के घरों में पानी नहीं पहुंच रहा। हालात यह हैं कि पिछले छह दिनों से जलापूर्ति ठप होने के कारण विस्थापित परिवारों को पीने के पानी के लिए परेशान होना पड़ रहा है। सवाल यह है कि जब पानी संग्रहण की इतनी बड़ी व्यवस्था मौजूद है, तो फिर पुनर्वास के लोगों के हलक क्यों सूख रहे हैं?

20 लाख लीटर की क्षमता, फिर भी प्यास क्यों?

निसरपुर पुनर्वास में पानी की समस्या कोई एक दिन की परेशानी नहीं है। स्थानीय व्यवस्था के अनुसार, लोगों को चार से पांच दिनों के अंतराल पर पानी मिलने की शिकायत है। इतनी लंबी अवधि के बाद होने वाली जलापूर्ति से परिवारों की जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं। अब पिछले छह दिनों से पानी नहीं मिलने की स्थिति ने संकट को और गंभीर बना दिया है।

जिन परिवारों ने विकास और बेहतर सुविधाओं की उम्मीद में अपना मूल निवास छोड़ा, क्या उनके हिस्से में यही व्यवस्था आई है? क्या पुनर्वास का मतलब सिर्फ मकान और सड़कें बना देना है, या फिर पीने का पानी उपलब्ध कराना भी शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी है?

‘मोटर जल गई’—आखिर कब तक चलेगा यही बहाना?

पानी की समस्या को लेकर जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से बार-बार मोटर जलने का हवाला दिए जाने की बात सामने आ रही है। सब इंजीनियर पीयूष टेकाम के स्तर पर इस समस्या का समाधान कब होगा, यह सवाल अब पुनर्वास के बाशिंदों के लिए अहम बन गया है।

यदि मोटर जल गई है, तो उसे ठीक कराने में आखिर इतनी देरी क्यों? वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई? क्या विभाग के पास अतिरिक्त मोटर, मरम्मत की व्यवस्था या टैंकर से जलापूर्ति का कोई इंतजाम नहीं है? तकनीकी खराबी कुछ समय के लिए हो सकती है, लेकिन छह दिनों तक लोगों को पानी के लिए परेशान छोड़ देना किस प्रशासनिक व्यवस्था की निशानी है?

मोटर खराब होना तकनीकी समस्या हो सकती है, लेकिन उसके समाधान में लगातार देरी व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल खड़े करती है। आखिर अधिकारी कब तक एक ही जवाब देकर अपनी जिम्मेदारी से बचते रहेंगे?

आदर्श पुनर्वास के दावे और जमीनी हकीकत में इतना अंतर क्यों?

नर्मदा परियोजना से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के समय बेहतर जीवन, मूलभूत सुविधाओं और व्यवस्थित बसाहटों की उम्मीद दिखाई गई थी। लेकिन निसरपुर पुनर्वास में पेयजल जैसी अनिवार्य सुविधा की अनियमितता इन दावों की वास्तविक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

पुनर्वास के बाशिंदों को पानी के लिए परेशान होना पड़े, तो विकास के दावों का लाभ आखिर किसे मिल रहा है? जिन लोगों ने विस्थापन का दर्द झेला, क्या उनकी बुनियादी जरूरतों की जिम्मेदारी अब किसी की नहीं रह गई है?

स्थानीय स्तर पर अन्य मूलभूत सुविधाओं को लेकर भी शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में सवाल केवल पानी की टंकी या मोटर का नहीं, बल्कि पुनर्वास की समूची व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही का है।

अधिकारियों से सीधे सवाल

जब पानी की दो टंकियों की कुल क्षमता 20 लाख लीटर है, तो नियमित जलापूर्ति सुनिश्चित क्यों नहीं हो पा रही?

चार से पांच दिनों के अंतराल पर पानी मिलने की स्थिति में परिवार अपनी जरूरतें कैसे पूरी करें?

पिछले छह दिनों से जलापूर्ति बाधित है, तो अब तक वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई?

मोटर खराब होने पर तत्काल मरम्मत या दूसरी मोटर की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी किसकी है?

क्या एनवीडीए विभाग के वरिष्ठ अधिकारी पुनर्वास की वास्तविक स्थिति का निरीक्षण कर रहे हैं?

विस्थापित परिवारों को नियमित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए जवाबदेह अधिकारी और समय-सीमा तय क्यों नहीं की जा रही?

अब आश्वासन नहीं, पानी चाहिए!

निसरपुर पुनर्वास के बाशिंदों को अब बार-बार के तकनीकी कारणों और आश्वासनों से राहत नहीं मिलने वाली। जरूरत इस बात की है कि एनवीडीए के वरिष्ठ अधिकारी तत्काल हस्तक्षेप करें, जलापूर्ति बहाल कराएं और नियमित पानी उपलब्ध कराने की स्थायी व्यवस्था सुनिश्चित करें।

सवाल सीधा है—जब पानी की टंकियां मौजूद हैं, व्यवस्था के लिए विभाग मौजूद है और जिम्मेदार अधिकारी भी नियुक्त हैं, तो फिर पुनर्वास के लोग प्यासे क्यों हैं? क्या जिम्मेदार अधिकारी किसी बड़े संकट का इंतजार कर रहे हैं, या फिर आम लोगों की परेशानी उनकी प्राथमिकता में ही नहीं है?

निसरपुर पुनर्वास के लोगों को भाषणों और कागजी दावों वाला आदर्श पुनर्वास नहीं, बल्कि घरों तक नियमित पेयजल चाहिए। अब देखना यह है कि एनवीडीए विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इस गंभीर समस्या पर कब तक कार्रवाई करते

हैं और प्यासे परिवारों को राहत कब मिलती है।

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