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पहले फूंक निकली, फिर जागा प्रशासन! : निसरपुर में साइकिल योजना बनी सरकारी लापरवाही का प्रतीक, बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ पर अब आनन-फानन में सुधार का दिखावा

Shiv Kumar Upwal

2 months ago 150 views
निसरपुर में साइकिल योजना बनी सरकारी लापरवाही का प्रतीक, बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ पर अब आनन-फानन में सुधार का दिखावा

शिवकुमार उपवाल,9993990544

निसरपुर,धार 23 जुलाई। सरकारी योजनाओं की सफलता के दावे मंचों पर गूंजते रहे, लेकिन निसरपुर में हकीकत ने उन दावों की हवा निकाल दी। विद्यार्थियों को सुविधा देने के नाम पर ऐसी नई साइकिलें थमा दी गईं जिनमें कई के टायरों में हवा तक नहीं थी, कुछ के पुर्जे ढीले थे और कई साइकिलें तकनीकी रूप से उपयोग योग्य ही नहीं थीं। सवाल यह है कि जब बच्चों को साइकिलें दी जा रही थीं, तब जिम्मेदार अधिकारी आखिर किस बात का निरीक्षण कर रहे थे?

शासन की निःशुल्क साइकिल वितरण योजना के तहत शासकीय मॉडल स्कूल और एकीकृत शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में कुल 64 विद्यार्थियों को साइकिलें वितरित की जानी थीं। लेकिन व्यवस्था की पोल उस समय खुल गई जब कई छात्र-छात्राओं को नई साइकिलें चलाने के बजाय उन्हें हाथ से धकेलकर घर ले जाना पड़ा।

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मंच पर तालियां, जमीन पर शर्मिंदगी

कार्यक्रम में मंच सजा, फोटो खिंचे, भाषण हुए और सरकारी योजनाओं की वाहवाही भी हुई। मगर किसी ने यह नहीं देखा कि जिन साइकिलों को बच्चों के भविष्य का सहारा बताया जा रहा है, वे चलने लायक भी हैं या नहीं। चार से छह किलोमीटर दूर गांवों से आने वाले गरीब विद्यार्थियों के लिए यह सुविधा नहीं, बल्कि नई परेशानी बन गई।

गुणवत्ता की पोल खुली तो 12 साइकिलों का वितरण रोका

मामला इतना गंभीर था कि एकीकृत शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में 21 में से केवल 9 छात्राओं को ही साइकिलें दी जा सकीं, जबकि 12 साइकिलों का वितरण तकनीकी खामियों के कारण रोकना पड़ा। यदि सब कुछ ठीक था तो फिर वितरण रोकने की नौबत क्यों आई? यह सवाल सीधे पूरी व्यवस्था पर खड़ा होता है।

हंगामे के बाद जागे जिम्मेदार

लगातार शिकायतें सामने आने और मीडिया व पालकों के सवाल उठने के बाद जिम्मेदारों की नींद खुली। गुरुवार को प्राचार्य स्वयं विद्यालय में मौजूद रहे। साइकिलों में हवा भरवाई गई, मिस्त्री बुलाकर मरम्मत करवाई गई और फिर उन्हें वितरण योग्य बनाया गया।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि वितरण से पहले जांच की गई थी तो बाद में मरम्मत की जरूरत क्यों पड़ी? और यदि जांच नहीं हुई थी तो जिम्मेदार कौन है?

पालकों का सीधा सवाल—क्या यही है सरकारी गुणवत्ता?

पालकों ने भी व्यवस्था पर नाराजगी जताते हुए कहा कि यदि सरकार विद्यार्थियों के बैंक खातों में राशि जमा कर देती तो वे अपनी ओर से कुछ राशि जोड़कर बेहतर गुणवत्ता की साइकिल खरीद लेते। उनका कहना है कि सरकारी योजना का उद्देश्य राहत देना है, न कि बच्चों को पहले दिन ही परेशानी में डाल देना।

जवाबदेही तय होगी या फिर फाइलों में दब जाएगा मामला?

ब्लॉक शिक्षा अधिकारी ने कहा है कि प्रत्येक केंद्र पर जांच की जिम्मेदारी तय की गई थी और लापरवाही मिलने पर कार्रवाई होगी। लेकिन अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि—

बिना जांच के साइकिलें वितरण के लिए किसने स्वीकृत कीं?

दोषपूर्ण साइकिलें विद्यालय तक कैसे पहुंचीं?

क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी या मामला औपचारिक जांच तक सीमित रहेगा?

सरकारी योजनाएं फोटो खिंचवाने और प्रेस नोट जारी करने से सफल नहीं होतीं। सफलता तब मानी जाती है जब लाभार्थी को सम्मानपूर्वक, गुणवत्तापूर्ण और उपयोगी सुविधा मिले। निसरपुर की यह घटना केवल साइकिलों की हवा निकलने की नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही की हवा निकलने का भी उदाहरण बन गई है। अब देखना यह होगा कि दोषियों पर कार्रवाई होती है या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों की धूल में दबकर रह जाएगा।

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