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अंगद के पांव की तरह जमे अधीक्षक, आखिर किसके संरक्षण में चल रहा यह खेल? : निसरपुर ब्लॉक के आश्रम-छात्रावासों में वर्षों से जमे अधीक्षकों पर उठे गंभीर सवाल, तबादला नीति बनी कागजी खानापूर्ति!

Shiv Kumar Upwal

3 months ago 100 views
निसरपुर ब्लॉक के आश्रम-छात्रावासों में वर्षों से जमे अधीक्षकों पर उठे गंभीर सवाल, तबादला नीति बनी कागजी खानापूर्ति!

जिम्मेदार सब जानते हैं, फिर भी साध रखी है चुप्पी... आखिर क्यों नहीं हो रही कार्रवाई....?*

शिवकुमार उपवाल,9993990544

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निसरपुर,धार 1 जुलाई 2026 । आदिम जाति कल्याण विभाग के अंतर्गत संचालित निसरपुर विकासखंड के शासकीय आश्रम एवं छात्रावास इन दिनों एक बार फिर सुर्खियों में हैं। वजह है—*वर्षों से एक ही संस्था में जमे अधीक्षक*, जिनका मोह अपनी कुर्सी से ऐसा जुड़ा हुआ है कि स्थानांतरण नीति भी उन पर बेअसर नजर आ रही है। विभागीय रिकॉर्ड और उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि कई अधीक्षक वर्षों से एक ही स्थान पर पदस्थ हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी सब कुछ जानते हुए भी आंखें मूंदे बैठे हैं।

प्रशासनिक व्यवस्था में समय-समय पर स्थानांतरण का उद्देश्य कार्यप्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्षता बनाए रखना होता है। लंबे समय तक एक ही स्थान पर पदस्थ रहने से न केवल प्रशासनिक निष्पक्षता प्रभावित होती है, बल्कि व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठने लगते हैं। बावजूद इसके, निसरपुर ब्लॉक के कई आश्रम एवं छात्रावासों में वर्षों से एक ही अधीक्षक अपनी कुर्सी पर जमे हुए हैं।

सूत्रों का कहना है कि विभागीय स्तर पर कई बार स्थानांतरण की चर्चाएं हुईं, लेकिन हर बार मामला फाइलों से आगे नहीं बढ़ पाया। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कुछ लोगों के लिए नियम अलग हैं? यदि तबादला नीति सभी कर्मचारियों पर समान रूप से लागू होती है तो फिर वर्षों से जमे इन अधीक्षकों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?

स्थानीय नागरिकों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि लंबे समय से एक ही स्थान पर पदस्थ रहने से संस्थानों की कार्यशैली पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जवाबदेही कमजोर होती है और व्यवस्थाओं में सुधार की संभावनाएं भी सीमित हो जाती हैं। ऐसे मामलों में समय-समय पर स्थानांतरण आवश्यक माना जाता है, ताकि नई कार्यशैली और पारदर्शिता को बढ़ावा मिल सके।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि संबंधित अधिकारियों के पास पूरी जानकारी होने के बावजूद अब तक कोई ठोस कदम सामने नहीं आया। इससे क्षेत्र में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर किसके संरक्षण में यह व्यवस्था वर्षों से चल रही है? क्या विभाग के नियम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं या फिर कुछ लोगों को विशेष संरक्षण प्राप्त है?

यदि उपलब्ध रिकॉर्ड सही हैं तो विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को तत्काल पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि किन परिस्थितियों में कुछ अधीक्षक वर्षों तक एक ही संस्था में पदस्थ बने रहे और उनके स्थानांतरण की प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई। पारदर्शी प्रशासन के लिए आवश्यक है कि नियमों का पालन सभी पर समान रूप से हो।

क्षेत्र के अभिभावकों और सामाजिक संगठनों का भी मानना है कि आश्रम एवं छात्रावास जैसी संवेदनशील संस्थाओं में नियमित प्रशासनिक बदलाव आवश्यक हैं। इससे व्यवस्था में नई ऊर्जा आती है, जवाबदेही तय होती है और संस्थानों के संचालन में सुधार होता है। यदि किसी अधिकारी का कार्य उत्कृष्ट है तो उसका मूल्यांकन नियमों के अनुसार किया जा सकता है, लेकिन एक ही स्थान पर अनिश्चितकाल तक पदस्थ रहना कई प्रश्नों को जन्म देता है।

अब निगाहें जिला प्रशासन और आदिम जाति कल्याण विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों पर टिकी हैं। देखना यह होगा कि वे उपलब्ध रिकॉर्ड का संज्ञान लेकर कार्रवाई करते हैं या फिर यह मामला भी अन्य फाइलों की तरह धूल फांकता रहेगा।

सवाल......

"कुर्सी अगर सेवा का माध्यम है तो फिर कुछ लोगों के लिए यह स्थायी पता कैसे बन गई? जब स्थानांतरण नीति हर कर्मचारी पर लागू होती है, तो वर्षों से जमे इन अधीक्षकों पर नियमों का पहिया आखिर क्यों थम जाता है? क्या व्यवस्था में जवाबदेही अब सिर्फ कागजों की शोभा बनकर रह गई है, या फिर कुछ चेहरों पर नियमों की स्याही सूख जाती है? जनता जवाब चाहती है और अब जिम्मेदारों की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है।"

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