21 साल तक पार्टी के लिए पसीना बहाया... अब जनता की आवाज़ उठाई तो अपनों : डूब प्रभावितों के दर्द पर फूटा भाजपा कार्यकर्ता का गुस्सा, संगठन और जनप्रतिनिधियों पर लगाए गंभीर आरोप
Shiv Kumar Upwal
"फोन उठाना बंद... बैठकों से बाहर... ग्रुपों से निकाला... क्या जनता के हक की बात करना गुनाह है?... अभयसिंह पटेल"
निसरपुर,धार 5 जुलाई 2026 । सरदार सरोवर परियोजना से प्रभावित डूब क्षेत्र का दर्द अब भाजपा के भीतर भी खुलकर सामने आने लगा है। वर्षों से पार्टी का झंडा उठाने वाले भाजपा के वरिष्ठ कार्यकर्ता एवं सरपंच अभय सिंह पटेल ने सार्वजनिक रूप से अपनी ही पार्टी के संगठन, जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
पटेल का कहना है कि 2017 से डूब प्रभावितों के साथ लगातार नीतिगत उलझन और अन्याय होता आया है। पहले गांवों को डूब क्षेत्र घोषित किया गया, सर्वे हुए, धारा 4, 9 और 12 की कार्रवाई हुई, मुआवजे और प्लॉट की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन बाद में कई परिवारों को डूब क्षेत्र से बाहर बताकर पुनर्वास पैकेज से वंचित कर दिया गया। इसके बावजूद आज भी कई बस्तियां बरसात में जलमग्न हो जाती हैं।
"21 साल पार्टी को दिए... बदले में मिला अपमान!"

अभय सिंह पटेल ने कहा कि—
21 साल तक भारतीय जनता पार्टी के लिए दिन-रात मेहनत की। परिवार से पहले संगठन को रखा। चुनावों में गांव-गांव जाकर पार्टी के लिए वोट मांगे। जिन लोगों ने हमारे कहने पर भाजपा को वोट दिया, आज उन्हीं की समस्याओं की बात कर रहा हूं तो पार्टी के लोग ही सुनने को तैयार नहीं हैं।"
उन्होंने आरोप लगाया कि—
समस्याओं की बात करो तो **फोन उठाना बंद कर दिया जाता है।
पार्टी बैठकों में बुलाना बंद कर दिया गया।
व्हाट्सएप ग्रुपों से बाहर किया जा रहा है।
सवाल पूछने वाले कार्यकर्ताओं को ही निशाना बनाया जा रहा है।
उन्होंने दो टूक कहा—
"अगर जनता के हक की लड़ाई लड़ना अपराध है, तो मैं यह अपराध बार-बार करूंगा। अगर संगठन को यह पसंद नहीं, तो मुझे पार्टी से बाहर कर दे।"
"माला, मंच और फोटो से विकास नहीं होता"
पटेल ने जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों पर निशाना साधते हुए कहा—
"फोटो खिंचवाने, मंच सजाने, भाषण देने और सोशल मीडिया पर रील बनाने से जनता की समस्याएं खत्म नहीं होतीं। जनता को कागजी घोषणाएं नहीं, ज़मीन पर समाधान चाहिए।"
उन्होंने चुनौती देते हुए कहा—

"अधिकारी, जनप्रतिनिधि और संगठन के बड़े नेता एक रात उन बस्तियों में रहकर दिखाएं जिन्हें कागजों में डूब से बाहर बताया गया है। अगर वे वहां रहने लायक बता दें, तो हम पुनर्वास पैकेज की मांग छोड़ देंगे।"
सवाल जो सत्ता से जवाब मांगते हैं...
* क्या डूब प्रभावितों को केवल चुनाव के समय याद किया जाएगा?
* सर्वे और पुनर्वास की नीतियों में बार-बार बदलाव क्यों?
* जिन परिवारों को डूब से बाहर बताया गया, वे आज भी पानी में क्यों डूब रहे हैं?
* क्या अपनी ही सरकार से सवाल पूछना पार्टी विरोध माना जाएगा?
* क्या कार्यकर्ताओं का सम्मान केवल चुनाव तक सीमित है?
जब अपने ही कार्यकर्ता यह कहने लगें कि जनता के लिए आवाज़ उठाने पर उन्हें हाशिए पर धकेला जा रहा है, तो यह केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि व्यवस्था के प्रति बढ़ते असंतोष का संकेत माना जा सकता है। डूब प्रभावितों की समस्याओं का समाधान नीतिगत और प्रशासनिक स्तर पर ही संभव है, और इस मुद्दे पर सभी पक्षों की जिम्मेदारी बनती है कि तथ्यों के आधार पर समाधान की दिशा में ठोस पहल करें।
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